September 29, 2022

 लेखक: डॉ गिरीश प्रताप

डॉ गिरीश प्रताप

वह एक शर्मिंदा इंसान था।

अपनी शर्मिंदगी पर उसे वाक़ई बड़ी शर्म आती थी , उसे लगता था,वो एक अजूबा है जो ऐसी बातों पर अपना दिमाग खर्च करता है जिन पर कोई ध्यान भी नहीं देता.

वह दिनरात  इसी सोच में लगा रहता की ऐसा क्यूँ होता है : क्या वह दूसरों से अलग है , या मानसिक रोगी है.

उसके परिवार ने भी उसे शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बच्चों का कहना था की पापा अजीब है , और पत्नी “ मुझे तुम्हारी अजीब सोच समझ नहीं आती “ कहकर अलग हो जाती। पड़ोसी उससे नाराज़ रहते और दफ़्तर के लोग “ फिर शुरू हो गया” कहकर मुस्कुराते।

उसे लगने लगा था की वो इस दुनिया के लिए बना ही नहीं है – हालाँकि ऐसा हमेशा से नहीं था। पहले जब वह स्कूल और कॉलेज में था तब उसे बड़ा साहित्यिक और संवेदन शील माना जाता था – प्रेमचंद को उसने सबसे ज़्यादा पढ़ा था , उसे इस बात पर गर्व हुआ करता था की वह  कहानी के पात्रों की व्यथा को उतनी ही गहराई से महसूस कर सकता था जितनी गहराई से प्रेमचंद ने लिखा है।

उसकी दादी , माँ , शिक्षक , सभी यही कहते रहे की ग़रीब , कमज़ोर और परेशान के कष्ट को समझना और उसकी यथा सम्भव मदद करना ही मानवता है। मूर्खतावश या अज्ञान वश अनजाने ही उसे मानवता का नशा हो गया – और मानवता ने ही आज उसे मज़ाक़ बना दिया ।

शादी और जन्मदिन के उत्सव में जब वह लोगों को पनीर , मिठाइयाँ और चावल से भरी प्लेट कचरे में फेंकते देखता तो उसे कूड़े में खाना खोजते बच्चे याद आते।वह अपने परिवार और मित्रों से कहता तो वे अनसुनी कर देते। मुँह धोते हुए बदस्तूर बहते पानी पर वह पानी की कमी बात करता तो बेटा अनसुनी कर पानी बहाता रहता।

उसके अपने बच्चे नित नए कपड़े मंगवाते,कुछ पहने जाते , कुछ अलमारी में सड़ते – जब वह अपनी लाड़ली बेटी को उन बच्चों के बारे में बताना चाहता जो नंगे घूमते है तो बेटी “ पापा आप तो रहने दो “ की झिड़की सुनाकर चली जाती और वह मूर्खों की तरह बग़लें झाँकता रह जाता।

ऐसी ही ना जाने कितनी बातों पर वह बोलता और अपमानित होकर चुप रह जाता – आत्मग्लानि में जलता रहता। उसे इस बात पर बड़ी शर्म आती कि परेशान वह अकेला है , उसका परिवार,मित्र, सभी शांत रहते है।


हद तो तब हो गयी जब मानवता के नशे में वह पुलिस के चक्कर में पड़ गया।

सड़क पर भीड़ लगी देख वह अपना पुराना स्कूटर रोककर देखने लगा। एक जवान लड़का ख़ून के तालाब में पड़ा तड़प रहा था। लोग अपने फ़ोन पर विडीओ बना रहे थे। कुछ देर तो वह असमंजस में चुप रहा पर अचानक ही उसे उस लड़के में अपना हमउम्र बेटा नज़र आने लगा और वह बोल पड़ा “ अरे भाई कोई तो इसे अस्पताल ले जाओ” भीड़ ने उसे बड़ी विचित्र नज़रों से देखा, कुछ दबी आवाज़ में मज़ाक़ उड़ाने लगे।

जब उससे रहा नहीं गया तो स्वयं ही एक आटो में लड़के को लादकर अस्पताल पहुँच गया।लड़का तो तबतक मर चुका था। उसका नाम डाक्टरों ने रजिस्टर में लानेवाले के पते में लिख लिया. चेहरा लटका कर वह घर आ गया.

अभी घर पहुँचा ही था की पुलिस आ पहुँची , मृतक के परिवार वाले भी साथ थे.

उसे देखते ही युवक के घरवाले मारपीट और गालीगलौज पर उतर आये, उसके  बाद पुलिस वाले तहक़ीक़ात में अजीब अजीब से सवाल पूछते रहे। निष्कर्ष यही था की वह उस लड़के को अस्पताल ले गया था तो एक्सिडेंट भी उस से ही हुआ था, और यदि एक्सिडेंट उस से नहीं हुआ था तो वह उसे अस्पताल ले कर गया क्यूँ था। जवाब देते देते वह थक गया पर पुलिस वाले उसे ना जाने कौन कौन सी धाराओं की धमकी देते रहे। उसके बाद का  समय उसके और घरवालो के लिये एक बुरे सपने की तरह बिता. वकील और पुलिस थाने के बीच वे सभी चकरघिन्नी बन घूमते रहे.

अदालत में पेशी तक हुई। जब उसने बताया की ना तो उसके पास कार है , न ही वह कार चलाना जानता है और उसका लाइसेन्स भी केवल स्कूटर का है तो जज ने उसे बरी  कर दिया।

इस घटना ने उसे सचमुच तोड़ दिया। ख़र्चा भी हुआ और परिवार परेशान भी हुआ। सबने उसे ख़ूब अपमानित किया। अपमान और ग्लानि में कभी घर में और कभी बिस्तर में छुपा रहा। घरवालों ने भी फ़ैसला सुना दिया की आगे से वे ऐसे झंझटों में नहीं पड़ेंगे।

अपनी मुर्खता पर शर्मिंदा होकर वह रजाई में घुसकर पड़ा रहता और सोचता रहता -सोचते सोचते उसके दिमाग़ में अचानक एक बिजली सी कौंध गयी , उसे लगा की उसे अपनी शर्मिंदगी का कारण पता लग गया। वह जान गया था की वह जो  ज़्यादा महसूस करता है वही उसकी शर्मिंदगी का कारण है, और इसी विचार के साथ उसे अपनी समस्या का निवारण भी मिल गया : उसने महसूस करना बंद कर दिया .

 ठंड में बिना कपड़ों के काँपता आदमी , सूख कर पापड़ होता भूखा बच्चा, अस्पताल में घूमते उदास चेहरे , कुचलकर सड़क पर पड़ा ख़ून से लथपथ जवान – उसने कुछ कोशिश की और उसे यह सब दिखना बंद हो गया;  अनजान  बना वह आगे बढ़ जाता. अब वह उनकी तकलीफों को महसूस नहीं करता.

अब वह मट्ठर हो गया था। अब वह सुखी हो गया था।

1 thought on “मट्ठर

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